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ब हुत पहले की बात है , कहीं किरातों के नगर में एक ब्राह्मण रहता था जो ज्ञान में अत्यंत दुर्बल, दरिद्र, रस बेचने वाला तथा वैदिक धर्म से विमुख था।  वह स्नान संध्या आदि कर्मो से भ्रस्ट हो गया था और वैश्य बृत्ति में तत्पर रहता था उसका नाम था देवराज। वह अपने ऊपर विश्वास करने वाले लोगो को ठगा करता था। उसने ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों, शूद्रों तथा दुसरो को भी अनेक बहानो से मारकर उनका धन हड़प लेता था। परन्तु उस पापी का थोड़ा सा भी धन कभी धर्म के काम नहीं लगा था। वह वेश्यागामी तथा सब प्रकार से आचार भ्रष्ट था। एक दिन घूमता-घामता वह देव योग से प्रतिष्ठानपुर (झूसी-प्रयाग) में जा पंहुचा। वहां उसने एक शिवालय देखा जहाँ बहुत से साधू महात्मा एकत्र हुए थे।  देवराज उस शिवालय में ठहर गया किन्तु वहां उस ब्राह्मण को ज्वर आगया। उस ज्वर से उस ब्राह्मण को बड़ी पीड़ा होने लगी। वहां  ब्राह्मण देवता शिव पुराण की कथा सुना रहे थे। ज्वर में पड़ा हुआ देवराज ब्राह्मण के मुखारविंद हुई उस शिव कथा को निरंतर सुनता रहा।  एक मास  के बाद वह ज्वर से अत्यन्तं पीड़ित होकर चल बसा।  यमराज के...